पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड
पौराणिक नदियां: क्या ये 13 पौराणिक नदियां अस्तित्व में है ?
हजारों लाखों साल बीत गए, जो था, अब नहीं है। अगर कुछ शेष है तो अपने मूल रूप में नहीं है। दुनिया की सभी प्राचीन सभ्यताएं नदियों के किनारे फली -फूली। इसी बीच धरती पर भोगौलिक परिवर्तन ने नदियों को अपनी दिशा बदलने पर मजबूर कर दिया। कुछ कई धाराओं में बंटकर धरती सींचने लगी, तो कुछ अलग दिशा पकड़ ली और तो और कुछ जमीन के अंदर ही समा गई।
इन नदियों की धारा परिवर्तन ने उन महान सभ्यताओं को भी पानी के बिना ख़त्म कर दिया या अपनी प्रचंड धारा में बहा ले गए। लेकिन फिर भी वे सभ्यताएं बच गई जो नदियां / प्रकृति के बदलाव के साथ स्वयं को भी बदलते गए। वो ऐसी सभ्यताएं थी जिनके संताने आज दुनियाभर में फ़ैल चुकी है और उनमें हम और आप भी हैं। हमारे पूर्वजों ने जो जानकारियाँ पुराण के रूप में लिखकर गएँ। वह ज्ञान, वह कथा आज कितना मिलता जुलता है ? इसी लेख में आगे संक्षिप्त व्याख्या करते हैं।
गंगा नदी, सरस्वती नदी और महानदी के आलावा इन 13 नदियों का नाम पद्मपुराण उत्तरखंड के अध्याय 23 में बताया गया है। भगवान शिव देवर्षि नारदजी को गंगा नदी की महिमा बताते हुए इन नदियों का नाम गिनाये हैं। श्लोक संख्या 2 से 6 को देखें –
गङ्गा गङ्गेति यो ब्रूयाद्यद्योजनानां शतैपि । मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति ॥२॥
चरणाब्जसमुद्भूता गङ्गा नामेति विश्रुता । पापानां स्थूलराशीनां नाशिनी चेति नारद ! ॥३॥
नर्मदा सरयूश्चैव तथा वेत्रवती नदी । तापी पयोष्णी चन्द्रा च विपाशा कर्मनाशिनी ॥४॥
पुष्या पूर्णा तथा दीपा विदीपा सूर्यनन्दना । सहस्त्रवृषदानात्तु यत्फलं लभते ध्रुवम् ॥५॥
तत्फलं समवाप्नोति गङ्गादर्शनतः क्षणात् । इयं गङ्गा महापुण्या ब्रह्मघ्नानां विशेषतः ॥६॥
इन श्लोकों का अर्थ है – जो मनुष्य हजारों योजन दूर से गङ्गाजी का नाम स्मरण करता है वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में जाता है ।।२।।
श्रीभगवान् के चरण कमल से उद्भूत नदी का गङ्गा नाम विख्यात है । हे नारदजी ! वह पापों की विशाल राशि’ का विनाश करने वाली हैं ।॥३॥
नर्मदा, सरयू, वेत्रवती नदी, तापी, पयोष्णी, चन्द्रा तथा विपाशा, कर्मनाशा, पुष्या, पूण्या, दीपा, विदीपा तथा यमुना इन नदियों में स्नान करने से तथा हजार वृषों का दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, उस फल की प्राप्ति मनुष्य गङ्गा के दर्शन मात्र से क्षण भर में प्राप्त कर लेता है। यह गङ्गा विशेष रूप से ब्रह्मघातियों को महान् पुण्य प्रदान करने वाली हैं ।॥४-६॥
नर्मदा, सरयू, वेत्रवती नदी, तापी, पयोष्णी, चन्द्रा, विपाशा, कर्मनाशा, पुष्या, पूण्या, दीपा, विदीपा तथा यमुना क्या ये नदियां आज के समय में अस्तित्व में है ? अगर है तो किस नाम से है और इसका रुपरेखा क्या है ?
तो आइये इन नदियों के बारे में चर्चा करते हैं:
1. नर्मदा नदी –
नर्मदा को आज भी उसी नाम से जाना जाता है जो नाम पुराण में भगवान शिव ने उल्लेख किया है। यह नदी भारत की एक प्रमुख और पवित्र नदी है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक से होता है और यह पश्चिम की ओर बहते हुए अरब सागर में मिलती है। इसे रेवा भी कहा जाता है। नर्मदा विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के बीच बहती है और लगभग 1312 किमी लंबी है।
नर्मदा न केवल आस्था की नदी है, बल्कि सिंचाई, जल और बिजली का महत्वपूर्ण स्रोत भी है। धार्मिक दृष्टि से नर्मदा का विशेष महत्व है। स्कंद पुराण के रेवाखंड में इसकी महिमा का वर्णन मिलता है।
मान्यता है कि भगवान शिव ने इसे 12 वर्ष की कन्या के रूप में प्रकट किया। नर्मदा को पाप नाशिनी कहा गया है और इसके तट तथा इसके पत्थर (नर्मदेश्वर शिवलिंग) अत्यंत पूज्य माने जाते हैं। रामायण, महाभारत तथा अनेक परवर्ती पुराण–ग्रंथों में नर्मदा नदी का गौरवपूर्ण उल्लेख मिलता है। पौराणिक परंपरा के अनुसार नर्मदा की एक नहर किसी सोमवंशी राजा द्वारा निकाली गई थी, इसी कारण इसे ‘सोमोद्भवा’ कहा गया। गुप्तकालीन ग्रंथ अमरकोश में भी नर्मदा का यही नाम मिलता है।
महाकवि कालिदास ने इसे सोमप्रभवा कहा है—रघुवंश में इसका उल्लेख है और मेघदूत में रेवा (नर्मदा) का अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण वर्णन मिलता है।
नर्मदा नदी की महिमा और रुपरेखा विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ –
नर्मदा नदी-इतिहास, आस्था और चेतना की नदी
विश्व में नर्मदा ही एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। पुराणों में कहा गया है कि जहाँ गंगा में स्नान से जो पुण्य फल मिलता है, वही फल नर्मदा के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है। भौगोलिक दृष्टि से भी नर्मदा अद्वितीय है—यह भारत की प्रमुख नदियों में से एक है जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है।
2. सरयू नदी
सरयू नदी आज भी अस्तित्व में है। सरयू नदी उत्तर भारत की एक प्राचीन और पवित्र नदी है, जिसका उल्लेख रामायण, महाभारत और अनेक पुराणों में मिलता है। यह नदी विशेष रूप से अयोध्या से जुड़ी हुई है, जहाँ भगवान श्रीराम का जन्म हुआ माना जाता है।
भौगोलिक रूप से सरयू का उद्गम उत्तराखंड–नेपाल हिमालय क्षेत्र में माना जाता है। आगे चलकर यही नदी विशाल रूप धारण कर घाघरा नदी कहलाती है, जो गंगा की प्रमुख सहायक नदी है। सरयू उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार से होकर बहती है। सरयू नदी उत्तराखण्ड के बागेश्वर ज़िले में उत्पन्न होती है, फिर शारदा नदी में विलय हो जाती है, जो काली नदी भी कहलाती है और उत्तर प्रदेश राज्य से गुज़रती है। शारदा नदी फिर घाघरा नदी में विलय हो जाती है, जिसके निचले भाग को फिर से सरयू नदी के नाम से बुलाया जाता है।
नदी के इस अंश के किनारे अयोध्या का ऐतिहासिक व तीर्थ नगर बसा हुआ है। सरयू फिर बिहार राज्य में प्रवेश करती है, जहाँ बलिया और छपरा के बीच में इसका विलय गंगा नदी में होता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार सरयू के तट पर स्नान, दान और तर्पण करने से पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्रीराम ने भी इसी नदी के तट पर अपनी लीलाएँ कीं और अंत में जल-समाधि ली। सरयू केवल एक नदी नहीं, बल्कि रामभक्ति, भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की जीवंत धारा है।
3. वेत्रवती नदी
वेत्रवती नदी का उल्लेख रामायण, महाभारत तथा अनेक पुराणों में मिलता है। प्राचीन ग्रंथों में इसे एक पवित्र और ऐतिहासिक नदी माना गया है। आधुनिक काल में वेत्रवती नदी को बेतवा नदी के नाम से जाना जाता है।
बेतवा नदी, जिसका प्राचीन नाम वेत्रवती था, भारत के मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश राज्यों में बहने वाली एक नदी है। यह यमुना नदी की उपनदी है। यह मध्य प्रदेश में रायसेन ज़िले के कुम्हारागाँव से निकलकर उत्तर-पूर्वी दिशा में बहती हुई भोपाल, विदिशा, झाँसी, ललितपुर आदि ज़िलों से होकर बहती है। इसके ऊपरी भाग में कई झरने मिलते हैं, किन्तु झाँसी के निकट यह काँप के मैदान में धीमे-धीमें बहती है।
इसकी सम्पूर्ण लम्बाई 480 किलोमीटर है। यह बुंदेलखण्ड पठार की सबसे लम्बी नदी है। यह हमीरपुर के निकट यमुना में मिल जाती है। इसके किनारे सांची और विदिशा के प्रसिद्ध व सांस्कृतिक नगर स्थित हैं। बीना नदी इसकी एक प्रमुख उपनदी है। यह बुंदेलखंड क्षेत्र की प्रमुख जीवनरेखा मानी जाती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार इस नदी के तट पर अनेक ऋषियों ने तपस्या की थी और कई प्राचीन नगर बसे थे। ऐतिहासिक दृष्टि से भी वेत्रवती के किनारे अनेक मंदिर, किले और सभ्यताएँ विकसित हुईं। वेत्रवती नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान है।
4. तापी नदी
माना जाता है कि नदी का नाम सूर्य देव और छाया की पुत्री देवी तापती के नाम पर रखा गया है । तापती शनि , भद्रा , यमुना और यम की बहन हैं ।
तापी नदी, जिसे ताप्ती भी कहा जाता है, भारत की प्रमुख और प्राचीन नदियों में से एक है। इसका उल्लेख रामायण, महाभारत और अनेक पुराणों में मिलता है। तापी का उद्गम मध्य प्रदेश के सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला में स्थित मुलताई (बैतूल जिला) से होता है।
यह नदी पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हुई मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर अरब सागर (खंभात की खाड़ी) में मिल जाती है। तापी भारत की कुछ चुनिंदा पश्चिमवाहिनी नदियों में से एक है और इसकी कुल लंबाई लगभग 724 किलोमीटर है। ताप्ती नदी की 14 प्रमुख सहायक नदियाँ हैं, जिनमें से चार दाहिनी ओर और दस बाईं ओर बहती हैं।
धार्मिक दृष्टि से तापी को पवित्र माना जाता है। इसके तट पर अनेक प्राचीन तीर्थ और नगर बसे हैं, जिनमें सूरत प्रमुख है। ऐतिहासिक और आर्थिक रूप से भी तापी नदी सिंचाई, व्यापार और नगर विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। तापी नदी केवल एक प्राकृतिक जलधारा नहीं, बल्कि मध्य भारत की सांस्कृतिक और जीवनदायिनी नदी है।
5. पयोष्णी नदी
पयोष्णी नदी का उल्लेख रामायण, महाभारत, पद्मपुराण तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों में एक पवित्र नदी के रूप में मिलता है। प्राचीन काल में यह नदी विदर्भ क्षेत्र (वर्तमान महाराष्ट्र) में विशेष महत्व रखती थी।
आधुनिक विद्वानों के अनुसार पयोष्णी नदी की पहचान आज की पूर्णा नदी या उसकी किसी प्राचीन धारा से की जाती है। महाराष्ट्र के विदर्भ/विन्ध्य पर्वत से दक्षिण की ओर प्रवाहित यह नदी अनेक ग्रामों व नगरों को सिंचित करती हुई क्षेत्र में बहती है और आगे चलकर तापी नदी तंत्र से जुड़ी मानी जाती है। वर्तमान समय में इसका प्रवाह सीमित और कई स्थानों पर मौसमी रह गया है। समय के साथ प्राकृतिक परिवर्तनों और मानवीय हस्तक्षेप के कारण इसका स्वरूप काफी बदल गया।
पौराणिक मान्यता के अनुसार पयोष्णी के तट पर ऋषि-मुनियों ने तपस्या की थी, जिससे यह नदी पुण्यदायिनी मानी गई। कहा जाता है कि सृष्टि के प्रारम्भ में जब ब्रह्माजी यज्ञ कर रहे थे तो उनके प्रणीता पात्र के गर्म जल से इस पयोष्णी नदी की उत्पत्ति हुई। इस ऊंचे तट वाली नदी के बंधे हुए पक्के घाट पर शारड़ग्घर भगवान का भव्य मंदिर है। इसी के तट पर मेघडकर तीर्थ है जिसे भगवान विनायक का साक्षात स्वरूप बताया गया है। पयोष्णी के तट पर प्राचीन काल से पिंगलेश्वरी देवी की मूर्ति प्रतिष्ठित है। पुराणों में इसकी बड़ी महिमा है।
राजा नल-दमयंती की कथा के उल्लेख से तथा राजा नृग के यज्ञ अनुष्ठान से भी इस नदी का विशेष महत्व है। वराह-तीर्थ से युक्त इस नदी के तट पर राजा गय (अमूर्तरया के सुपुत्र) ने भी 7 अश्वमेध यज्ञ किए थे जिससे परम प्रसन्न होकर इन्द्र ने सोमपान किया तथा यज्ञ में मिली दक्षिणा से आनन्दमग्न ब्राह्मणों ने यशोगान किया।
6. चन्द्रा नदी
चन्द्रा नदी का उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रंथों और पुराणों में एक पवित्र नदी के रूप में मिलता है। यद्यपि आज “चन्द्रा” नाम से कोई बड़ी स्वतंत्र नदी स्पष्ट रूप से पहचान में नहीं आती, फिर भी विद्वानों के बीच इसके स्वरूप को लेकर कई मत हैं।
एक मान्यता के अनुसार चन्द्रा नदी को चन्द्रभागा से जोड़ा जाता है, जिसे आज चेनाब नदी कहा जाता है। चन्द्रभागा का उद्गम हिमालय क्षेत्र में होता है और यह सिंधु नदी प्रणाली की प्रमुख नदियों में से एक है। कुछ विद्वान चन्द्रा को हिमाचल प्रदेश की चंद्रा नदी (लाहौल–स्पीति क्षेत्र) से भी जोड़ते हैं, जो आगे चलकर भागा नदी से मिलकर चन्द्रभागा बनाती है।
समय के साथ भौगोलिक परिवर्तनों, नाम-परिवर्तन और नदी धाराओं के विलय के कारण “चन्द्रा” नाम एक प्राचीन स्मृति के रूप में ग्रंथों में सुरक्षित रह गया, जबकि इसका आधुनिक रूप अलग नामों से जाना जाने लगा।
इस प्रकार चन्द्रा नदी आज भले ही अपने मूल नाम से स्पष्ट न दिखे, पर इसका अस्तित्व चन्द्रभागा/चेनाब या हिमालयी चंद्रा-भागा तंत्र के रूप में माना जाता है, जो भारतीय नदी परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है।
7. विपाशा नदी
विपाशा नदी का उल्लेख वेदों, महाभारत और पुराणों में मिलता है। आधुनिक काल में इसे ब्यास नदी के नाम से जाना जाता है। इसका उद्गम हिमाचल प्रदेश में होता है और यह पंजाब से होकर बहती हुई सिंधु नदी प्रणाली में सम्मिलित होती है। विपाशा सप्तसिंधु की प्रमुख नदियों में से एक है और प्राचीन भारत की सभ्यता के विकास में इसका विशेष योगदान रहा है।
8. कर्मनाशा नदी
कर्मनाशा नदी मध्य भारत की एक प्रसिद्ध नदी है, जिसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। यह मध्य प्रदेश से निकलकर उत्तर प्रदेश और बिहार से होकर बहती है तथा गंगा में मिल जाती है। धार्मिक मान्यताओं में इसे लेकर विरोधाभास मिलते हैं, परंतु भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से यह एक वास्तविक और महत्वपूर्ण नदी है।
9. पुष्या नदी
पुष्या नदी का उल्लेख पुराणों में मिलता है, किंतु आधुनिक भौगोलिक मानचित्रों में यह स्वतंत्र नदी के रूप में स्पष्ट रूप से पहचान में नहीं आती। विद्वानों के अनुसार यह किसी बड़ी नदी की लुप्त उपधारा या प्राचीन स्थानीय नदी रही होगी, जो कालांतर में सूख गई या किसी अन्य नदी में विलीन हो गई।
10. पूण्या नदी
पूण्या नदी का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में एक पुण्यदायिनी नदी के रूप में हुआ है। वर्तमान समय में इस नाम से कोई स्वतंत्र नदी ज्ञात नहीं है। संभव है कि यह किसी क्षेत्रीय नदी का प्राचीन नाम हो या फिर इसका उल्लेख आध्यात्मिक एवं प्रतीकात्मक अर्थ में किया गया हो।
11. दीपा नदी
दीपा नदी का उल्लेख भी पुराणों में मिलता है, किंतु आज इसके भौगोलिक अस्तित्व के स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसे विद्वान एक लुप्त नदी मानते हैं, जिसका अस्तित्व केवल शास्त्रीय ग्रंथों और स्मृतियों में सुरक्षित रह गया है।
12. विदीपा नदी
विदीपा नदी का संबंध प्राचीन विदिशा क्षेत्र से जोड़ा जाता है। पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है, परंतु आधुनिक काल में यह नदी पूर्णतः लुप्त मानी जाती है। संभव है कि यह नदी कालांतर में सूख गई हो या किसी अन्य नदी में समाहित हो गई हो।
13. यमुना नदी
यमुना नदी भारत की सबसे पवित्र और प्रमुख नदियों में से एक है। इसका उद्गम उत्तराखंड के यमुनोत्री हिमनद से होता है और यह उत्तर भारत से होकर बहती हुई प्रयागराज में गंगा से मिलती है। यमुना का विशेष संबंध भगवान श्रीकृष्ण और ब्रजभूमि से है। धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यमुना भारतीय सभ्यता की आधारशिला मानी जाती है।
पद्मपुराण (उत्तरखण्ड, अध्याय 23) में उल्लिखित ये 13 पौराणिक नदियाँ केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय सभ्यता, भूगोल और सांस्कृतिक स्मृति का भी सजीव प्रमाण हैं।
इनमें से कुछ नदियाँ—जैसे नर्मदा, सरयू, वेत्रवती (बेतवा), तापी, विपाशा (ब्यास), कर्मनाशा और यमुना—आज भी स्पष्ट रूप से अस्तित्व में हैं, यद्यपि कई का स्वरूप समय के साथ बदल चुका है। कुछ नदियाँ—जैसे पयोष्णी और चन्द्रा—आज अपने प्राचीन नाम या स्वतंत्र पहचान के बजाय किसी अन्य नदी-तंत्र में समाहित रूप में देखी जाती हैं। वहीं पुष्या, पूण्या, दीपा और विदीपा जैसी नदियाँ भौतिक रूप से लुप्त हो चुकी हैं, परंतु शास्त्रों और परंपराओं में उनका स्मरण आज भी जीवित है।
यह स्पष्ट होता है कि पुराणों में वर्णित नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं थीं, बल्कि वे सभ्यताओं की जननी, आध्यात्मिक साधना की भूमि और प्राकृतिक चेतना की वाहक थीं। भूगोल ने भले ही उनका रूप बदला हो, पर उनका महत्व समाप्त नहीं हुआ। आज भी ये नदियाँ—चाहे प्रवाहित हों या स्मृति में—हमें यह सिखाती हैं कि भारतीय संस्कृति ने प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही अपने अस्तित्व को आगे बढ़ाया है।
इस दृष्टि से पौराणिक नदियों का अध्ययन हमें अतीत को समझने के साथ-साथ भविष्य के लिए प्रकृति-संरक्षण और सांस्कृतिक चेतना का संदेश भी देता है।
जय श्री हरी
Source: पद्मपुराण
ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏
