पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड
अध्याय 17: माया, पतिव्रता धर्म और हरि-हर की दिव्य लीला
जय श्री हरी
पतिव्रता नारी की शक्ति इतनी शक्तिशाली होती है जिसके सामने देवता ही नहीं ईश्वर भी हार मान लेते हैं। कहते हैं भगवान भोले भक्तों के लिए बिलकुल भोले हैं जो मांग लो मिल जायेगा। जबकि श्रीहरि भक्त को वो कभी नहीं देते जो वो चाहता है बल्कि वो देते है जो उसके लिए सबसे अच्छा और जन्म जन्मांतर का पाप कर्म मिटा दे। दोनों दो रूप होकर भी एक ही हैं। और यही तो उनकी लीला है।
वृंदा की पतिव्रता व्रत ने जालंधर को त्रिलोक्य में अजेय बना दिया था। लेकिन परस्त्री गमन और परपुरुष गमन हर किसी व्यक्ति के लिए घातक होता है। ये स्थिति जानबूझकर हो या अनजाने में व्यक्ति का कर्म माफ़ नहीं होते। पतन निश्चित है।
जालंधर ने वृंदा जैसी पतिव्रता नारी से विमुख होकर देवी पार्वती को पाने की इच्छा से सीधे महादेव से युद्ध कर बैठा , सीधे ईश्वर से , जिसने संसार बनाई और उस प्रकृति देवी पर बुरी नजर रख दिया जिस प्रकृति में हम जीते हैं।
देवी वृंदा पतिव्रता जरूर थी लेकिन एक कमी रह गई कि वह अपने पति जालंधर की बढ़ती हुई आकांक्षा को रोकने में असफल रही हालाँकि वह कोशिश बहुत की लेकिन असफल रही। ठीक वैसे ही जैसे हस्तिनापुर की राजसभा में द्रोपदी का चीरहरण रोकने के लिए भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य खूब कोशिश किये लेकिन असफल रहे। पूरी कोशिश नहीं किये क्योंकि वे अपने व्यक्तिगत परिस्थियों और प्रतिज्ञा से बंधे थे। परिणाम क्या हुआ सबको पता है।
शिव–पार्वती और माया की उलझन
जालंधर को देवी वृंदा की पतिव्रता धर्म ही अजेय बनाया था लेकिन वह भूल गया। मानसरोवर के युद्ध ने शिवजी, माता पार्वती, गणेशजी, कार्तिकेय जी और शिवगणों को अलग थलग कर दिया था। जो मायावी शक्ति भगवान शिव के सामने जाते ही भस्म हो जाता था और जो देवी स्वयं माया और प्रकृति देवी जगदम्बा हो उन्हें भी असुर जालंधर ने मोहित कर रखा था।
जालंधर ने विचित्र चाल चला एक तरफ भगवान शिव और उनके गणों को शुम्भ के साथ युद्ध में व्यस्त कर दिया। शुम्भ जालंधर का रूप बनाकर युद्ध कर रहा था और माया के प्रभाव से शिवजी उसे पहचान न सके।
दूसरी ओर जालंधर स्वयं शिवजी का रूप बना लिया और वह अपने साथी दुर्वारण को नंदी बना दिया। दोनों देवी पार्वती के पास हार और पश्चाताप करते हुए पहुँच गए। उसने देवी पार्वती को भी अपनी बातों से उलझा दिया। शिव रूपी जालंधर के मन में सिर्फ वासना भरा था। जो देवी स्वयं सृष्टि को मोहित कर देती हैं, वही उस समय जालन्धर की माया में मोहित हो गईं।
पार्वती की बुद्धि और सखी जया की परीक्षा
देवर्षि नारद ने देवी पार्वती और भगवन शिव की सहायता के लिए क्षीरसागर में श्रीहरि के पास गए और सारी स्थिति बताये। श्रीहरि ने गरुड़जी को सही स्थिति का आकलन करने के लिए मानसरोवर भेजा।
गरुड़जी जब लौटकर श्रीहरि को बताये तब उन्होंने जालंधर की सकती को नष्ट करने के लिए देवी वृंदा का पतिव्रता धर्म नष्ट करने के लिए माया की रचना की जिसमे वे सफल रहे।
श्री हरी के द्वारा जालंधर की पत्नी देवी वृंदा का पतिव्रता धर्म भ्रष्ट हो किया जा चूका था इसलिए अब देवी पार्वती पर जालंधर का माया प्रभाव धीरे धीरे कम होने लगा।
जब वह मायावी जालन्धर, शंकर का रूप लेकर आया, और उसने माता पार्वती को देखा—तो पार्वतीजी भीतर से बहुत व्याकुल हो गईं। लेकिन उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। उन्होंने मन ही मन सोचा, “मैंने सच्चे शिवजी को तपस्या करके पाया है। यह कुछ उचित नहीं लग रहा… इसलिए मैं चुप रहूँगी।”
कुछ देर तक उन्होंने उसकी ओर देखा। जब उन्हें लगा कि उसके सामने बोलना या विरोध करना ठीक नहीं है। तब वे वहाँ से उठकर बाहर निकल आईं।
बाहर आकर उन्होंने आकाश में बहती हुए गंगा आकाशगंगा को देखी। उन्हें लगा कि यह स्थान तपस्या के लिए उपयुक्त है। उन्होंने निश्चय किया— “पहले भी मैंने कठोर तपस्या करके भगवान शंकर को प्राप्त किया था। इस बार भी मैं उसी तरह उन्हें प्राप्त करूँगी।”
यह सोचकर वे अपनी सखियों के साथ आगे चल दीं। चलते-चलते उन्होंने आकाश से दूध की धार जैसी शुभ्र मन्दाकिनी नदी को मानसरोवर पर्वत पर गिरते देखा। दृश्य ऐसा लग रहा था; जैसे आकाश में पड़े मोतियों की माला टूटकर धरती पर उतर रही हो। जैसे स्वर्ग से कोई दिव्य जलधारा खींचकर नीचे लाई जा रही हो। जैसे ब्रह्माजी के मुख से ऋचाएँ बह रही हों। उस दिव्य गंगा को देखकर माता गौरी प्रसन्न हो गईं।
वे सखियों के साथ उसमें स्नान करके निकलीं, अपने शरीर की पूजा करके गंगा तट पर बैठ गईं। फिर पार्वतीजी ने अपनी सखी जया की ओर देखा और बोलीं “सखि जया! जल्दी करो। तुम मेरा रूप धारण करके वहाँ जाओ और पता लगाओ कि यह सच में शिव हैं या कोई और मायावी।
यदि वह तुम्हें पास खींचकर आलिंगन करने लगे तो समझ लेना कि वह कोई असुर है। लेकिन यदि वह तुम पर क्रोधित होकर तुम्हें डाँटे या भला-बुरा कहे तो समझना कि वही मेरे शिव हैं। जो भी पता चले, तुरंत आकर मुझे बताना।” जया ने पार्वतीजी की आज्ञा मानी और उनका स्वरूप धारण करके मायावी शिव अर्थात जालन्धर के पास चली गई।
कर्म का प्रतिफल – न पार्वती मिली और न वृंदा को बचा सका
जब जया वहाँ पहुँची, तो कामवासना से ग्रस्त जालन्धर ने उसे पार्वती समझ लिया और उसे गले लगा लिया। ऐसा करते ही जालन्धर का तुरंत वीर्यस्खलन हो गया और उसकी शक्ति समाप्त हो गई। जया ने क्रोध से कहा— “तुम शिव नहीं हो! तुम पापी हो। मैं पार्वती नहीं, उनकी सखी जया हूँ।”
तुमने बड़ा पाप किया है।” फिर जया ने अपना वास्तविक रूप दिखाया और जालन्धर से कहा— “इस पाप का परिणाम तुम्हें मिलेगा। भगवान शिव के हाथों ही तुम्हारी मृत्यु होगी।”
उसके बाद जया पार्वतीजी के पास पहुँची और बोली— “देवि, जो आपके पास शिव के रूप में आया था, वह वास्तव में जालन्धर था।” यह सुनते ही पार्वतीजी भयभीत हो गईं और पास ही एक कमल के भीतर छिप गईं। जालन्धर के डर से कमलों के आसपास उड़ती भौरें भी बेचैन हो गईं। उधर, जब वृन्दा जंगल से वापस नहीं लौटी, तो उसके रक्षक चिंतित होकर युद्धभूमि में पहुँच गए।
शुम्भ ने जब उनसे पूछा, तो उन्होंने सारी बात बताकर भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की। वृन्दा के अपहरण की खबर मिलते ही शुम्भ डर गया और तुरंत रुद्र से युद्ध बीच में ही छोड़कर चण्ड और मुण्ड को जालन्धर के पास भेज दिया।
चण्ड-मुण्ड बड़ी तेज़ी से मानसोत्थर पर्वत पहुँच गए, जहाँ जालन्धर शिव का रूप बनाकर बैठा था। वे पेड़ के पीछे से बोले – “राजन, दूर चली गई पत्नी से क्या लाभ? न शत्रु उसे ढूँढ़ सकते हैं, न अपने लोग उसके साथ रह पाते हैं।”
फिर उसने कहा- “रुद्र ने शुम्भ को हरा दिया है और उसकी सेना को नष्ट कर दिया है। अब आप युद्ध के लिए चलिए। पार्वती को आप कभी नहीं पा सकते। सिंह की पत्नी गीदड़ को कभी नहीं मिल सकती!”
चण्ड और मुण्ड ने जालन्धर से कहा – “राजन्, जैसे अंधकार कभी सूर्य की चमक नहीं पा सकता, वैसे ही आप भी पार्वती को नहीं पा सकते। शिव की शक्ति आपके बस की बात नहीं है।
उधर सुना गया है कि भगवान विष्णु आपकी रानी वृन्दा को अपने लोक में ले गए हैं। इसलिए समय न गँवाएँ—युद्ध की तैयारी करें। या तो शिव को हराकर सर्वेश्वर बन जाएँ, या फिर उनके बाणों से मारे जाकर उनके लोक तक पहुँचें।”
यह सुनते ही जालन्धर का क्रोध भड़क उठा। आँखें लाल हो गईं और वह तुरंत पर्वत से नीचे उतर पड़ा। चण्ड-मुण्ड को आश्वस्त करके और शिव का रूप छोड़कर वह अपनी सेना की ओर बढ़ा। चलते समय उसने अपने सेनापति दुर्वारण से कहा – “देखो, विष्णु ने मेरी रानी को छल से अपने लोक में ले लिया। मैंने सुना था कि घर जमाई पर भरोसा नहीं करना चाहिए। अब यह बात सत्य लग रही है। जो दामाद घर में रहे, वह धीरे-धीरे घर की संपत्ति और घर की स्त्रियों तक पर अधिकार जमा लेता है। यह सब उसी का परिणाम है।”
दुर्वारण ने शांतस्वर में उत्तर दिया – “राजन्, हर इंसान को अपने कर्म का फल मिलता ही है। आप पार्वती का हरण करने आए थे, इसलिए भगवान विष्णु ने आपकी पत्नी का अपहरण किया—यह उसी कर्म का प्रतिफल है।
अब प्रश्न यह है कि पहले किससे युद्ध किया जाए—शिव से या विष्णु से?”
जालन्धर ने चिंतित होकर कहा – “पहले मैं किसे जीतूँ? हर (शिव) को या हरि (विष्णु) को?”
दुर्वारण ने सलाह दी – “यदि आप सीधा विष्णु पर आक्रमण करेंगे, तो शिव पीछे से हमला कर देंगे। दोनों ओर से आप फँस जाएँगे। इसलिए पहले शिव को परास्त कीजिए। शिव आपके मार्ग में दीवार की तरह खड़े हैं। जब आप शिव को जीत लेंगे और वे आपके अधीन हो जाएँगे, तब विष्णु से लड़ना आसान होगा। पहले दैत्यों के पास चलिए और ऐसा भयंकर युद्ध कीजिए कि आपकी वीरता की चर्चा सब जगह हो।” दुर्वारण की बुद्धिमत्तापूर्ण सलाह सुनकर जालन्धर ने निर्णय ले लिया। वह सीधे भगवान शिव से महान युद्ध करने के लिए निकल पड़ा।
इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के छठे उत्तर खण्ड के जालन्धरोपाख्यानान्तर्गत जालन्धर के माया परित्याग नामक सत्रहवें अध्याय का हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।१७।।
Source: पद्मपुराण
ॐ नमः शिवाय 🙏 जय श्रीहरि 🙏
