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पद्ममहापुराण — उत्तरखण्ड

अध्याय 13: मानसरोवर का ऐतिसिक युद्ध-2


जय श्री हरी

बात उस समय की है जब महाशक्तिशाली असुर जालंधर ने भगवान शिव से युद्ध करने के लिए कैलाश पर्वत की ओर चल पड़ा। लेकिन जालंधर और उसकी सेना के कैलाश पहुँचने से पहले ही भगवान शिव ने देवी पार्वती, गणेशजी, कार्तिकेय और अन्य सभी देवगण को लेकर मानसरोवर के उत्तर घाटी मानसोत्तर में चले गए। लेकिन जालंधर और उसकी सेना ढूंढते हुए मानसोत्तर भी पहुँच गया और चारो तरफ से पर्वत को घेर लिया।

मानसरोवर के ऐतिसिक युद्ध की तैयारी

यहीं पर एक ऐतिहासिक युद्ध हुआ जिसे मानसरोवर का ऐतिसिक युद्ध कहा जाता है। चुकी जालंधर देवी पार्वतीजी को हरण करने के लिए युद्ध में उतरा था इसलिए भगवान शिव ने उनकी सुरक्षा की दृष्टि से भगवान शंकर ने पार्वतीजी को अपनी सखियों के साथ पर्वत के सबसे ऊँचे शिखर पर सुरक्षित बैठाया। फिर स्वयं महायोद्धा शिव ने कवच धारण किया, उनके साथ तीस हज़ार महापद्म-प्रभव गण तैयार खड़े थे।

फिर भगवान शंकर ने अपने महान सेनापति नन्दी को आदेश दिया कि वह युद्ध में जाकर उस महान दैत्य जालंधर का संहार करे। महाकाल और अन्य वीर गणों के साथ मिलकर जालंधर और उसकी सेना का अंत करे। भगवान शंकर ने अपने दोनों पुत्रों, श्री गणेश और कार्तिकेय — को नन्दी की रक्षा के लिए नियुक्त किया। दोनों ने कवच धारण किया, अपने-अपने वाहन पर आरूढ़ हुए, और नन्दी के चारों ओर गणों की सेना उमड़ पड़ी।

मानसरोवर ऐतिसिक युद्ध की शुरुआत-देवगणों और दैत्यों के बीच महायुद्ध

उसी समय पर्वत पर असुर सेना चढ़ गए और सेनापति नंदी की सैन्य टुकड़ी पर हमला कर दिय। किन्तु शिवगणों अपने तीक्ष्ण अस्त्रों से उन पर पलटवार किया। क्षण भर में कई दैत्य घायल होकर धरती पर गिर पड़े। देवगणों और दैत्यों के बीच महायुद्धआरम्भ हो गया।

चारों ओर से बाणों की वर्षा होने लगी। आकाश में धनुषों की टंकार गूंज उठी, धरती रणभूमि बन गई। शिवगणों में जो मयूरमुख वाले योद्धा थे और जो काकतुण्ड गण थे । उन्होंने अपने प्रहारों से दैत्यों के हाथी, रथ, घोड़े और पैदल सैनिकों का नाश कर दिया। वह दृश्य अत्यंत भयानक था ।

शिवगण अडिग थे — हर प्रहार के साथ “हर हर महादेव!” की गूँज आकाश में फैल रही थी। नंदी और शिवगण जब दैत्यों को मारकर आगे बढ़े, तो यह देखकर शुंभ, निशुंभ, कोलाहल, राहु, सर्परोमा, घर्घर, जम्भ, पातालकेतु, रोमकण्टक जैसे बड़े-बड़े दैत्य युद्ध के लिए आगे आ गए। अब दोनों पक्षों की विशाल सेनाएँ आमने-सामने थीं।

शुंभ नंदी से भिड़ गया। निशुंभ महाकाल से युद्ध करने लगा। कोलाहल मायापूर्वक माल्यवान से लड़ने लगा। राहु स्कंद (कार्तिकेय) की ओर दौड़ा। घर्घर मदन से भिड़ा जम्भ विनायक को मारने दौड़ा। पातालकेतु हास से लड़ने लगा। रोमकंटक भृंगी से युद्ध करने लगा। एक ओर करोड़ों रुद्रगण थे, दूसरी ओर दैत्य- दोनों पक्षों के स्वामी युद्ध को देख रहे थे। शिवगण और दैत्य जोर-जोर से एक-दूसरे पर हमला कर रहे थे।

नंदी और सुम्भ का युद्ध

मानसरोवर के इस ऐतिसिक युद्ध में नंदी ने शुंभ पर बाणों की इतनी तेज़ वर्षा की, मानो पहाड़ों पर मूसलाधार बारिश हो रही हो। बाणों से शुंभ का चेहरा भर गया। क्रोधित होकर शुंभ ने धनुष फेंका और सीधा नंदी की ओर दौड़ा। एक बड़ा पर्वत उखाड़कर उसने नंदी के सीने पर दे मारा! पर्वत की चोट से नंदी का रथ टूट गया, और नंदी भी थोड़ी देर के लिए मूर्छित होकर गिर पड़े। होश आने पर वे तुरंत वहाँ से हट गए।

महाकाल और निशुंभ का सामना

मानसरोवर के इस ऐतिसिक युद्ध में  उधर महाकाल ने निशुंभ पर अपने भारी मुद्गर (गदा) से प्रहार किया। लेकिन शक्तिशाली निशुंभ ने उस प्रहार की परवाह ही नहीं की। ववह गरजते हुए आगे बढ़ा, और महाकाल के पैर पकड़कर उन्हें दूर फेंक दिया।

पुष्पदन्त और कबन्ध का युद्ध

मानसरोवर के इस ऐतिसिक युद्ध में  शैलरोमा ने पुष्पदंत के मुख पर मुक्का मारा। पुष्पदंत ने तुरंत गदा से प्रहार कर उसे गिरा दिया। उसे गिरा देखकर गिरिकेतु आया और उसने पुष्पदंत को मुद्गर से मारा। तब पुष्पदंत ने तलवार से गिरिकेतु का सिर काट दिया। पौराणिक कथा के अनुसार, गिरिकेतु का कटा हुआ सिर, अपने शरीर का चर्म और तलवार उठाकर दौड़ पड़ा! वह चिल्ला रहा था।

“भाग क्यों रहे हो? मैं अभी युद्ध करने के लिए तैयार हूँ!”

यही नहीं यह बिना सिर वाला शरीर (कबन्ध) ने पुष्पदंत पर वार किया। उसने पुष्पदंत के पैर पकड़कर तलवार से उसका पेट चीर दिया। पेट चीरते ही भीतर से एक भयानक दैत्य निकला, जिसके सौ सिर, दो सौ आँखें, और दो सौ हाथ थे! उसका कटा हुआ सिर फिर से घूमता हुआ उसके शरीर के पास आ गया। उस आये हुए शिर को देखकर पुष्पदन्त ने उसको तलवार से काट दिया।

 मानसरोवर के इस ऐतिसिक युद्ध जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, शिवगण और दैत्यों के बीच लड़ाई और भी भयानक होती जा रही थी। पुष्पदन्त के हाथों एक-एक करके तीन असुर मारे जाने के बाद एक साथ दो शक्तिशाली दैत्यों ने एक साथ पुष्पदन्त पर हमला कर दिया। भूकम्पन और ज्वर नाम के दो भयंकर दैत्यों ने पुष्पदंत पर प्रहार किया। दोनों के तेज और शक्ति से पुष्पदंत बहुत परेशान हो गया। कमज़ोर पड़कर वह लड़ाई छोड़कर काँपता हुआ पर्वत की ओर भाग गया।

माल्यवान और ज्वर दानव का युद्ध

कोलाहल नामक दैत्य ने महान योद्धा माल्यवान पर हमला किया— कंधे और माथे पर प्रहार किया। माल्यवान ने भी तुरंत पलटकर कोलाहल को हथियारों से मारना शुरू किया। दोनों के बीच तीव्र युद्ध चला। फिर माल्यवान ने एक पर्वत का भारी पत्थर उठाकर कोलाहल पर दे मारा। उसके प्रहार से एक भयंकर ज्वर दानव (ज्वारासुर) प्रकट हुआ— उसके तीन सिर, नौ पैर, नौ हाथ, शरीर पीला था। उस ज्वर ने अपना तेज दिखाकर माल्यवान को मूर्छित कर दिया। माल्यवान भी पीड़ा से पर्वत की ओर भाग गया।

चण्ड के पुत्र के हृदय से घोडा निकला

चण्ड का पुत्र जब युद्धभूमि में खड़ा था, तभी उस पर इतना भयानक प्रहार हुआ कि पूरा पर्वत काँप उठा। आघात लगते ही उसके हृदय में भयंकर कंपन हुआ और अगले ही क्षण उसके भीतर से एक अग्नि-स्वरूप घोड़ा निकल पड़ा! वह दैत्य-घोड़ा क्रोध से हिनहिनाता हुआ आकाश को चीरता समुद्र की ओर भागा और गर्जन करते हुए सीधा समुद्र में कूद गया। युद्धभूमि स्तब्ध थी। देवगण भी इस अद्भुत दृश्य को देखकर आश्चर्यचकित रह गए।

राहु ने कार्तिकेयजी को युद्धभूमि छोड़ने पर मजबूर किया

कार्तिकेय ने तीखे बाणों से राहु को मारना शुरू किया। उन्होंने राहु पर अपनी शक्ति (शस्त्र) भी फेंकी। वह शक्ति इतनी तेज थी कि राहु आकाश में कूदकर उसे अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया और जोर-जोर से हँसने लगा। राहु बिना सिर के भी लड़ रहा था। उसने कार्तिकेय पर उसी शक्ति से वार कर दिया। वह शक्ति कार्तिकेय के सीने पर लगी, और उनके शरीर से तीव्र वेग से नदी जैसा प्रवाह निकलने लगा। वह धारा कार्तिकेय को बहाकर ले गई। जब धारा रुकी, तब वे किसी तरह पर्वत की ओर चले गए।

युद्धभूमि से देवगण और शिवगण के पैर उखड़ने लगे

अग्निदेव को बर्बर नामक दैत्य ने कृपाण से मार दिया। सर्परोमा नाम के दैत्य ने कूष्मांड के सिर पर जोर से मुक्का मारा। पातालकेतु ने हास को मुद्गर से मारा, और उसके शरीर से निकला हाथी उस मुद्गर को खा गया! फिर पातालकेतु ने उस हाथी की सूँढ पर प्रहार किया। रोमकण्टक ने हथियारों से भृंगीश को घायल कर दिया, और भृंगीश डरकर पर्वत पर भाग गया। अचानक वह धूम्रकेतु केतु के मुख में गिर पड़ा। फिर उस विशालकाय दैत्य ने पूरे गण को निगल लिया। इससे सेना में भारी हाहाकार मच गया।

शोर-गुल सुनकर जालंधर प्रसन्न हुआ। देवता और शिवगण हार रहे थे और युद्ध के मैदान छोड़कर भाग रहे थे। असुर भी भारी संख्या में मारे जा रहे थे लेकिन जालंधर को अपनी सेना की चीखें भी कोयलों के गीत से भी ज्यादा मीठी लगीं। उसे अपनी शक्ति पर घमंड बढ़ रहा था। वह ऊँचे पर्वत से युद्ध का दृश्य देख रहा था और गौरवान्वित हो रहा था। वह इंतजार कर रहा था भगवान् महादेव की। उसकी यह इच्छा गणेशजी के कारण बहुत जल्दी ही पूर्ण होनेवाला था।

विनायक की करुण पुकार

जंभ नामक दैत्य ने तेज बाणों से विनायक (गणेशजी) के शरीर के हिस्से काट दिए। फिर उसने फरसे से गणेशजी की सूँढ काट दी। जंभ दैत्य ने शक्ति से गणेशजी के पेट पर प्रहार किया। गणेशजी घायल होकर एक अंधेरी गुफा में चले गए। वह बहुत दर्द से चिल्ला रहे थे। “हाय माँ! हाय पिता! हाय भाई! हाय मेरे प्रिय मूषक!”

गणेशजी की दर्द भरी आवाज़ सुनकर माँ पार्वती घबराकर तुरंत शिवजी के पास पहुँचीं। वे बोलीं- “स्वामी! दैत्य गणेश को मार रहे हैं। स्कन्द (कार्तिकेय) भी घायल होकर गिर पड़े हैं। आप यहाँ पर्वत पर खेल क्यों रहे हैं? कृपया अपने दोनों पुत्रों और गणों की रक्षा कीजिए!”

 

महादेव का युद्धभूमि में प्रवेश

इसके बाद शिवजी जब युद्ध में जाने लगे तो उन्होंने देवी पार्वती से कहा- “हे प्रिये! मैं युद्ध के लिए जा रहा हूँ। दानव बहुत दुष्ट हैं। तुम यहाँ अपने तेज से स्वयं अपनी रक्षा करना।” ऐसा कहकर शिवजी तीस हज़ार महापद्म-गणों के साथ रणभूमि की ओर निकल पड़े।

  1. वीरभद्र सिंहवाहन रथ पर चढ़कर शिवजी के बाएँ रक्षक बन गए।
  2. मणिभद्र अश्वों वाले रथ पर सवार होकर दाहिने पक्ष में चलने लगे।

उँचे पर्वत से उतरकर शिवजी और उनकी सेना युद्धभूमि पहुँची। नंदी पर बैठे महादेव को देखकर दैत्य जोर-जोर से गर्जना करने लगे। इसके बाद दोनों ओर से ऐसा युद्ध छिड़ा कि दिशाएँ काँप गईं। जो गण पहली बार डरकर भाग गए थे (नंदी, महाकाल, कालस्कन्द, माल्यवान, पुष्पदन्त, चण्डीश, स्वर्णदंतिक, कूष्माण्ड, गुप्तलोमक) वे सब फिर साहस लेकर युद्ध में उतर आए।

इधर महाबली दैत्य चारों ओर से शिवजी को घेरने लगे, जैसे पाँच इंद्रियाँ मनुष्य को घेर लेती हैं। वे शूल, गदा, मुद्गर और भाले लेकर महादेव पर टूट पड़े। लेकिन शिवजी ने तीक्ष्ण बाणों से उन सभी दैत्यों का नाश कर दिया, वैसे ही जैसे माघ के पवित्र स्नान से पाप तुरंत मिट जाते हैं।

मानसरोवर युद्ध का अगला भाग अगले पोस्ट में पढ़ें।

ॐ नमः शिवाय 🙏