मंगलाचरण:
🔱 पद्म महापुराण – षष्ठ उत्तरखण्ड – अध्याय 1 Part-1 🔱
“जब जीवन के अंधकार में भक्ति की एक किरण चमकती है, तब शास्त्रों का प्रकाश आत्मा को दिशा देता है।
आज हम प्रवेश कर रहे हैं पद्म महापुराण के षष्ठ उत्तरखण्ड के प्रथम अध्याय में — जहाँ नारद और शिव का संवाद हमें भगवद्भक्ति के परम रहस्यों से परिचित कराता है।
“मित्रों, पद्म महापुराण का यह षष्ट खंड उत्तरखण्ड है जिसके पहले अध्याय में कुल 70 श्लोक है जिसे हम तीन भागों में प्रस्तुत कर रहें हैं।
मित्रों, यह पहला भाग है। हमने किसी भी श्लोक में कोई बदलाव नहीं किया है क्योंकि यह प्राचीन और सनातन भारत की अमूल्य धरोहर है।
पाठकों को सरलतम रूप से समझने के लिए हमने पद्म महापुराण श्लोक के साथ साथ अर्थ और व्याख्या भी प्रस्तुत किया है। एक महत्वपूर्ण और मुख्य बात यह है कि इस पाठ में पद्म महापुराण के सम्पूर्ण श्लोकों को दर्शाया है जो सिलसिलेबार आपको मिलेगा।
आइए, श्लोक दर श्लोक इस दिव्य ज्ञान का रसपान करें।
🔱 मंगलाचरण 🔱
पद्म महापुराण के षष्ठ उत्तरखण्ड के अध्याय 1 के पहले दो श्लोक में मंगलाचरण किया गया है –
श्लोक १:
ॐ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥१॥
अर्थ: ॐ का उच्चारण कर मैं नारायण, उत्तम पुरुष नर और नरोत्तम को प्रणाम करता हूँ। फिर देवी सरस्वती और महर्षि व्यास को नमन कर विजय की कामना करता हूँ।
भावार्थ: यह शास्त्रपाठ का पारंपरिक मंगलाचरण है — जिसमें ईश्वर, गुरु, और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को प्रणाम कर, हम दिव्य कथा की सफलता की प्रार्थना करते हैं।
श्लोक २:
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥२॥
अर्थ: जो अज्ञान के अंधकार में डूबे हुए जीव की आंखों को ज्ञानरूपी अंजन से खोल देता है, ऐसे श्रीगुरुदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।
भावार्थ: गुरु ही वह दीपक है जो अज्ञान के तमस को मिटा कर आत्मा की दृष्टि खोलता है। यही भाव श्रद्धा से इस श्लोक में अर्पित है।
पद्म महापुराण के षष्ठ उत्तरखण्ड के अध्याय 1 के तीसरे श्लोक से कथा की शुरुआत होती है –
श्लोक ३:
ऋषय ऊचुः
श्रुतं पातालखण्डं च त्वयाऽऽख्यातं विदांवर ।
नानाख्यानसमायुक्तं परमानन्ददायकम् ॥३॥
अर्थ: ऋषियों ने कहा — हे विद्वज्जनों में श्रेष्ठ! आपने पातालखण्ड का वर्णन हमें सुनाया, जो विविध कथाओं से युक्त और परम आनंद देने वाला है।
भावार्थ: ऋषि मुनि कथा कहने वाले सूत जी की प्रशंसा कर रहे हैं, और पहले कहे गए पातालखण्ड की मधुर स्मृति कर रहे हैं।
श्लोक ४:
अधुना श्रोतुमिच्छामो भगवद्भक्तिवर्धनम्। ।
पाद्ये यच्छेषमस्तीह तद्ब्रूहि कृपया गुरो ! ॥४॥
अर्थ: अब हम भगवान की भक्ति को बढ़ाने वाला वह शेष प्रसंग सुनना चाहते हैं, जो अभी बाकी है। कृपा करके हे गुरुदेव, उसे कहिए।
भावार्थ: श्रवण की यह जिज्ञासा ही मुक्ति की ओर पहला कदम है। ऋषि अब भगवान की भक्ति से जुड़े रहस्य जानना चाहते हैं।
श्लोक ५:
सूत उवाच शृणुध्वं मुनयः सर्वेः यदुक्तं शङ्करेण हि।
पृच्छते नारदायैव विज्ञानं पापनाशनम् ॥५॥
अर्थ: सूत जी बोले — हे समस्त मुनियों! अब आप सब सुनें वह ज्ञान जो भगवान शंकर ने नारद से कहा था, जो पापों का नाश करने वाला है।
भावार्थ: अब कथा की मुख्य धारा प्रारंभ होती है — जब शिव स्वयं नारद को पवित्र विज्ञान उपदेश देते हैं।
श्लोक ६:
एकदा नारदो लोकान्पर्यटन्भगवत्प्रियः ।
गतोऽद्रिं मन्दरं शम्भुं प्रष्टुं किञ्चिन्मनोगतम् ॥६॥
अर्थ: एक बार भगवान के प्रिय भक्त नारद मुनि लोकों में विचरण करते हुए मंदर पर्वत पर भगवान शंभु से कुछ मन की बात पूछने गए।
भावार्थ: नारद, जो स्वयं भक्ति के अग्रदूत हैं, अब शिव के पास भक्ति से जुड़े गूढ़ प्रश्न लेकर जा रहे हैं। कथा में गहराई आने लगती है।
श्लोक ७:
तत्रासीनमुमानाथं प्रणिपत्य शिवाज्ञया ।
उपविष्टः समादिष्ट आसनेऽभिमुखो विभोः ॥
पप्रच्छ चेदमेवेशं यन्मा पृच्छथ सत्तमाः ॥७॥
अर्थ: वहाँ शिवजी को पार्वती सहित विराजमान देखकर नारद ने उन्हें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा से उनके सामने आसन पर बैठकर वही प्रश्न पूछा जो श्रेष्ठ मुनियों ने उनसे पूछा था।
भावार्थ: यह श्लोक गुरु-शिष्य परंपरा और श्रद्धा की मर्यादा दर्शाता है — कैसे जिज्ञासु शिष्य उचित विनम्रता से ज्ञान के लिए प्रस्तुत होता है।
श्लोक ८:
नारद उवाच भगवन्देवदेवेश ! पार्वतीश ! जगद्गुरो ! ।
भगवत्तत्त्वविज्ञानं येन स्यात्तन्ममादिश ॥८॥
अर्थ: नारद बोले — हे भगवान! देवों के अधिपति! पार्वतीपति! जगत के गुरु! मुझे वह भगवत्तत्त्व का ज्ञान बताइए जिससे भगवान की प्राप्ति संभव हो।
भावार्थ: यहाँ नारद एक ही प्रश्न पूछते हैं — भगवान के तत्व को कैसे जाना जाए? यह प्रश्न संपूर्ण अध्यात्म और भक्ति का मूल है।
श्लोक ९:
शिव उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि पुराणं वेदसंमितम् ।
यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥९॥
अर्थ: शिव बोले — हे नारद! मैं तुम्हें वह पुराण कहता हूँ जो वेदों के समान है। उसे सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।।
भावार्थ: अब ज्ञान की गंगा बहने वाली है। स्वयं महादेव वेदों-समान पुराण का उद्घाटन कर रहे हैं।
श्लोक १०:
प्रथमोत्तरकीर्तिः स्यात्पर्वताख्यानमेव च।
जालन्धरं तथाऽऽख्यानं श्रीशैलाख्यं ततः परम् ॥१०॥
अर्थ: यह पुराण चार प्रमुख खण्डों में विभक्त है — प्रथम उत्तर कीर्ति, पर्वताख्यान, जालंधराख्यान, और फिर श्रीशैलाख्यान।
भावार्थ: यह श्लोक इस ज्ञान यात्रा की रूपरेखा देता है — कि किस प्रकार यह पुराण विभिन्न खण्डों में भगवद्कथा को प्रकट करेगा।
श्लोक ११:
हरिद्वारस्य व्याख्यानं विष्णुपादोद्भवं तथा ।
प्रयागतीर्थं ते वक्ष्ये दशाश्वमेधिकं च तत् ॥११॥
अर्थ: मैं हरिद्वार का वर्णन करूँगा, जो भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न हुआ है, और साथ ही प्रयाग तीर्थ तथा दशाश्वमेध नामक पुण्य क्षेत्र का भी वर्णन करूँगा।
भावार्थ: यहां से शिवजी तीर्थों के महत्व की कथा प्रारंभ करने वाले हैं। हरिद्वार और प्रयाग जैसे पुण्य क्षेत्र जो मोक्ष के द्वार हैं — इनकी महिमा आगे वर्णित की जाएगी
श्लोक १२:
तुलसीमहिमा चैव शङ्खच शङ्खचक्रगदादिकम्।
द्वारकायास्तथाऽऽख्यानं महोत्सवविधिस्ततः ॥१२॥
अर्थ: तुलसी की महिमा, शंख, चक्र, गदा आदि की महत्ता, द्वारका की कथा और वहाँ के महोत्सवों की विधि का भी वर्णन किया जाएगा।
भावार्थ: भक्ति में उपयोग होने वाले प्रतीकों का आध्यात्मिक महत्व — जैसे तुलसी, शंख, चक्र — और भगवान की लीला भूमि द्वारका का भावपूर्ण चित्रण, इस पुराण में आएगा।
श्लोक १३:
तटाकजं तथा पुण्यं वापीकूपप्रपादिजम् ।
गाणपत्यं ततो वक्ष्ये वैष्णवागममेव च ॥१३॥
अर्थ: तालाब, कुएँ, बावड़ी जैसे जल-स्रोतों की महिमा का वर्णन किया जाएगा, फिर गणेश संबंधी ज्ञान और वैष्णवों के आगम ग्रंथों की भी चर्चा होगी।
भावार्थ: सनातन संस्कृति में जलस्थानों को केवल भौतिक नहीं, आध्यात्मिक साधना का स्थल माना गया है। साथ ही गणपति और वैष्णव सम्प्रदाय की साधना का विवेचन आगे आएगा।
श्लोक १४:
जीर्णोद्धारस्य माहात्म्यं मन्दाकिनीसमागमम् ।
साभ्रमत्यास्तु माहात्म्यं माहात्म्यं तीरजं तथा ॥१४॥
अर्थ: पुराने और खंडित तीर्थों के जीर्णोद्धार का महत्व, मन्दाकिनी नदी के संगम की महिमा, और भ्रमत्या नदी तथा अन्य तीर्थों की महिमा का भी वर्णन किया जाएगा।।
भावार्थ: जो साधक खंडित स्थलों का जीर्णोद्धार करते हैं, वे अपार पुण्य के भागी होते हैं — यह श्लोक उसी कर्म की गरिमा बताता है। साथ ही पवित्र नदियों के संगमों का पुण्य फल प्रकट किया जाएगा।
श्लोक १५:
स्त्रीशूद्राणां तथा धर्मं तथा त्याज्यैश्च धारणम्।
उमामहेशसंवादे प्रोक्तं नामसहस्रकम् ॥१५॥
अर्थ: स्त्रियों और शूद्रों का धर्म, क्या त्याज्य है और क्या धारणीय है — ये सब बातें उमामहेश्वर संवाद में वर्णित हैं, साथ ही विष्णु के हजार नाम भी उसी में बताए गए हैं।
भावार्थ: यह श्लोक यह दर्शाता है कि धर्म केवल ब्राह्मणों के लिए नहीं, बल्कि स्त्रियों और समाज के हर वर्ग के लिए सुलभ है। उमामहेश संवाद में यह ज्ञान एक दिव्य स्रोत के रूप में दिया गया है।
श्लोक १६:
कैलासात्तत्त्समानीतं नारदेनाग्रजन्मना ।
लोकानां ब्राह्मणानां च क्षत्त्रियणां विशेषतः ॥१६॥
अर्थ: यह ज्ञान पूर्वजन्म वाले नारद द्वारा कैलास से लाया गया था, जो विशेष रूप से ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए उपयुक्त है।
भावार्थ: यह ज्ञान उच्चतर लोकों से, दिव्य संप्रेषण के रूप में प्राप्त हुआ है। इसकी पवित्रता और प्रभाव अत्यंत महान है, विशेषकर उन जातियों के लिए जो धर्म कार्यों में प्रवृत्त हैं।
श्लोक १७:
स्त्रीशूद्राणां विशेषेण पठितव्यं समाहितैः ।
इदं पवित्रं परमं पुण्यमायुष्यवर्धनम् ॥१७॥
अर्थ: यह शास्त्र स्त्रियों और शूद्रों द्वारा विशेष रूप से श्रद्धा के साथ पढ़ा जाना चाहिए। यह पवित्र, परम पुण्यदायक और आयु को बढ़ाने वाला है।
भावार्थ: यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि भक्ति और धर्म का मार्ग सभी के लिए है — कोई जातिगत रोक नहीं। भाव, श्रद्धा और समर्पण ही मुख्य योग्यता है।
श्लोक १८:
पठितव्यं विशेषेण विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् ।
विष्णोर्नामसहस्रं तत्पावनं भुवि विश्रुतम् ॥१८॥
अर्थ: इसका पाठ विशेष रूप से किया जाना चाहिए, क्योंकि यह विष्णु से सायुज्य (एकत्व) की प्राप्ति कराता है। श्रीविष्णु का यह सहस्रनाम भूतल में प्रसिद्ध और पावन है।
भावार्थ: विष्णु सहस्रनाम केवल स्तुति नहीं, आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाला मंत्र है। जो इसे श्रद्धा से जपे, वह मोक्ष को प्राप्त करता है।
श्लोक १९:
चतुर्विंशतिमूर्तीनां स्थानकानीह संवदे ।
तेषां च मातापितरावन्तरं च ब्रवीम्यहम् ॥१९॥
अर्थ: यहाँ भगवान विष्णु की 24 मूर्तियों के स्थानों का वर्णन होगा, और उनके माता-पिता तथा मध्य रूपों की भी चर्चा की जाएगी।
भावार्थ: श्रीविष्णु की विविध मूर्तियाँ उनके अलग-अलग स्वरूपों की चेतना को दर्शाती हैं। इन स्थानों का वर्णन भक्तों को आध्यात्मिक प्रेरणा देता है।
श्लोक २०:
गोत्रं वेदांश्च तेषां वै कर्माणीह तथैव च।
स्त्रियस्तेषां प्रवक्ष्यामियथाविज्ञानदर्शनात् ॥२०॥
अर्थ: उनकी वंश परंपरा, वेद-अनुसार कर्म, और उनकी स्त्रियों (पत्नी) का भी वर्णन मैं यथायोग्य ज्ञान के अनुसार करूँगा।
भावार्थ: यह श्लोक बताता है कि पुराण केवल कथात्मक नहीं, सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपरा का विस्तृत वृत्तांत भी है — जिसमें भगवान के कुल, कर्म और संगिनी का ज्ञान भी महत्वपूर्ण है।
🔚 संवाद की भूमिका 🔚
इस प्रकार प्रथम 20 श्लोकों में शिव और नारद के मध्य होने वाले संवाद की भूमिका स्थापित होती है। यह संवाद केवल कथाओं का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत है — जिसमें तीर्थों की दिव्यता, तुलसी की पवित्रता, गणेश और वैष्णव साधना का स्वरूप, तथा श्रीविष्णु के हजार नामों की महिमा का सूत्रपात होता है।
शिवजी ने संकेत दिया है कि यह ज्ञान केवल ब्राह्मणों या ऋषियों तक सीमित नहीं है — बल्कि स्त्री, शूद्र, गृहस्थ, सभी के लिए यह एक जीवंत धर्मगाथा है।
यहाँ वर्णित विष्णु सहस्रनाम और 24 मूर्तियों का विवरण भक्तों को भक्ति, ज्ञान और मोक्ष के द्वार तक ले जाने वाला है। अब कथा उस भाग में प्रवेश करती है जहाँ ये विषय विस्तार से प्रकट होने लगते हैं।
जय श्री हरि 🙏
स्रोत: पद्म महापुराण उत्तर खंड ग्रन्थ
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