पद्म महापुराण — उत्तरखंड (अध्याय 5)

क्षीरसागर के मन्थन का कारण जानने के लिए — जालन्धर द्वारा इन्द्र के पास दूत भेजना


🙏 जय श्री हरि

प्रिये दर्शकों! पद्म महापुराण की अद्भुत कथा-श्रृंखला में हम अब पहुँच चुके हैं उत्तरखंड के पाँचवें अध्याय पर।

पिछले अध्यायों में आपने सुना — नैमिषारण्य वन में सूतजी मुनियों को कथा सुनाते हुए कहते हैं कि महाभारत युद्ध के बाद और राज्य प्राप्त होने के बावजूद पांडव बड़े दुखी थे। यह जानकर मुनिश्रेष्ठ नारदजी महाराज युधिष्ठिर के पास आये। दोनों के बीच बातचीत के सन्दर्भ में कथा होती है। नियति का लिखा कोई रोक नहीं सकता। स्वर्ग के अधिपति इंद्र को गीत संगीत से मन ऊब गया तो भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश गए और शिवजी के समान ही योद्धा से युद्ध करने का वरदान मांग लिया। भगवान शिव के क्रोध ने काला छाया के रूप में प्रस्तुत हुआ और भगवान शिव से बोला – क्या आज्ञा है प्रभु ! भगवान शिव ने उसे इंद्र को जितने का आदेश दिया। वह काली छाया गंगा और समुद्र के मिलन से जालंधर के रूप में जन्म लिया। ब्रह्माजी ने उसे देवताओं से अजेय होने का वरदान दिया। समुन्द्र ने अपना जल समेटकर अपने पुत्र के लिए जमीन दिया जो आज भी जालंधर के नाम से प्रसिद्द है। असुर गुरु शुक्राचार्य के नेतृत्व में जालंधर ने राज्य स्थापित किया और वृंदा से विवाह किया। हमने अध्याय ३ और ४ में चर्चा कर चुके है।

कैसे इन्द्र के अहंकार और भगवान शिव के क्रोध से काली छाया प्रकट हुई, जो आगे चलकर समुद्रपुत्र जालन्धर के रूप में जन्मी। ब्रह्माजी ने उसे अजेयता का वरदान दिया, असुर गुरु शुक्राचार्य ने उसका मार्गदर्शन किया और जालन्धर ने वृन्दा से विवाह कर अपनी असुरराज्य की नींव रखी।

अब प्रश्न उठता है —

  • 👉 आखिर देवताओं और जालन्धर का वैर क्यों हुआ?
  • 👉 समुद्र मन्थन का कारण जालन्धर से कैसे जुड़ता है?
  • 👉 और इन्द्र को दूत भेजने की घटना क्यों घटी?

इन्हीं रहस्यों का वर्णन अध्याय पाँच में मिलता है।


युधिष्ठिर ने पूछा —
“हे नारदजी! जालन्धर का पितृव्य कौन था? देवताओं से उसका वैर क्यों हुआ? और उसने युद्ध क्यों किया?” ॥१॥

नारदजी ने उत्तर दिया —
“हे राजन्! सुनो — जालन्धर का पितृव्य (चाचा) स्वयं क्षीरसागर था। देवताओं ने उसका मन्थन किया और उसके धन-रत्न को छीन लिया।”॥२॥

🌊 समुद्र मन्थन से उत्पन्न दिव्य रत्न:

  • लक्ष्मी जी
  • चन्द्रमा
  • अमृत
  • ऐरावत (हाथी)
  • उच्चैःश्रवा (घोड़ा)

आदि सम्पूर्ण रत्न देवताओं और असुरों ने बाँट लिए। ॥३॥

यह सुनकर जालन्धर के हृदय में देवताओं के प्रति वैर उत्पन्न हुआ — “मेरे पितृव्य क्षीरसागर के धन को देवताओं ने छीन लिया है; यह अन्याय है। इसका प्रतिकार करना होगा।”

फिर उसने अपने विश्वासी असुर-नायक दुर्वारण को दूत बनाकर इन्द्र के पास भेजा। ॥४॥
दुर्वारण रथ पर बैठकर स्वर्गलोक की ओर गया और इन्द्र के द्वार पर पहुँचा; पर द्वारपालों ने उसे रोका। ॥५॥

दूत ने कहा — “मैं समुद्रपुत्र जालन्धर का दूत हूँ। इन्द्र से मिलना चाहता हूँ। जाकर इन्द्र को मेरा संदेश दो।” ॥६॥

  • 👉 जब मनुष्य अथवा देवता लोभ में आकर दूसरों का अधिकार छीन लेते हैं, तो वैर और युद्ध का जन्म होता है।
  • 👉 समुद्र मन्थन से उत्पन्न रत्नों ने देवताओं को समृद्ध किया पर वही रत्न जालन्धर के वैर का कारण बने।
  • 👉 नियति का लिखा कोई रोक नहीं सकता — इन्द्र का अहंकार, समुद्र मन्थन और जालन्धर का उदय सब एक पूर्वनियोजित लीला हैं।

नारदजी ने कहा:

उस दूत की वाणी सुनकर वह तुरंत देवराज इन्द्र के पास पहुँचा और विनम्र भाव से बोला— “महाराज! भूलोक से एक दूत आपका संदेश लेकर आया है।” ॥७॥

इन्द्र ने द्वारपालों को आज्ञा दी—

“उसे भीतर लाओ।” तुरंत द्वारपालों ने दूत का हाथ पकड़कर उसे इन्द्र की सभा में उपस्थित कर दिया। ॥८॥

सभा में प्रवेश करते ही दुर्वारण ने अद्भुत दृश्य देखा— तैंतीस करोड़ देवताओं के मध्य दिव्य प्रभा से आभामंडित इन्द्र विराजमान थे। ॥९॥

इन्द्र स्वर्णमय सिंहासन पर बैठे थे। उनके चारों ओर दिव्य चामरों से शीतल वायु की सेवा हो रही थी। शची के प्रेम और सौंदर्य से पुलकित होकर उनके सहस्र नेत्र आनंद से प्रफुल्लित थे। ॥१०॥

दुर्वारण ने बृहस्पति के साथ तेजोमय इन्द्र को देखा। उसके नेत्र मानो देवेश के वैभव का उपहास करते हों। तथापि, गर्व से भरकर उसने इन्द्र को प्रणाम किया और सभा में उपस्थित हुआ। ॥११॥

इसके पश्चात जालंधर का दूत निर्दिष्ट आसन पर बैठ गया।

इन्द्र ने प्रश्न किया— “बताओ, तुम किसके दूत हो? और किस उद्देश्य से यहाँ आए हो?” ॥१२॥

दुर्वारण ने निर्भीक स्वर में उत्तर दिया— “मैं असुरराज जालंधर का दूत हूँ। जो सम्पूर्ण लोकों के अधिपति हैं। उनका आदेश सुनो, जिसे मैं तुम्हारे समक्ष प्रकट करता हूँ।” ॥१३॥

“उन्होंने कहा है— क्षीरसागर मेरे पितृव्य हैं। फिर तुमने उनका मंथन क्यों किया? मन्दराचल पर्वत के द्वारा तुमने उनके कोष और धन-रत्नों को छीन लिया है।” ॥१४॥

“हे पुरन्दर! तुमने श्रीलक्ष्मी, चन्द्रमा, अमृत और दिव्य हाथी ऐरावत को अपने अधीन कर लिया। अब उचित यही है कि इन्हें लौटा दो और शीघ्र ही स्वर्ग से चले जाओ।” ॥१५॥

    👉 इस तरह यह प्रसंग केवल शाब्दिक संवाद नहीं, बल्कि देवासुर संघर्ष की प्रस्तावना है। दुर्वारण के शब्दों में जालंधर की गर्वित सत्ता, इन्द्र का ऐश्वर्य और आसन्न युद्ध की आहट स्पष्ट झलकती है।

नारदजी कहते हैं:

दुर्वारण ने इन्द्र को कठोर वचनों से ललकारते हुए कहा—

“हे देवराज! शिखण्ड जैसे अलंकार धारण करके तुम अपने को मयूर के समान क्यों सजा रहे हो? मैना-पक्षी की मधुर तान के समान तुम्हारे वन्दीजनों का स्वर किस काम का? बालक-पक्षियों की मीठी बोली से यदि अमृत भी झरे, तो पिता का होना किस लाभ का?

नारी यदि हंसिनी की चाल से चले तो उससे क्या सिद्धि होती है? और यदि वन्दीजन शुकपक्षी की भाँति पाठ करें तो क्या उपयोग है? बताओ—किस गुण के कारण तुम जैसे साधारण कौए को सुवर्ण-पिंजरे में रखा जाए?” ॥१६॥

“यदि प्राणों से प्रेम है तो जाकर मेरे स्वामी जालंधर से क्षमा माँगो, और उनकी आज्ञा का पालन करो। वही तुम्हारे लिए कल्याणकारी होगा।” ॥१७॥

नारदजी आगे कहते हैं:

दुर्वारण की यह कठोर वाणी सुनकर इन्द्र ठहाका मारकर हँस पड़े। और गर्वपूर्ण स्वर में उन्होंने कहा— ॥१८॥

इन्द्र बोले:

“हे दूत! ध्यान से सुनो। मैं तुम्हें समुद्र-मंथन का कारण संक्षेप में बताता हूँ।

प्राचीन काल में हिमालय का पुत्र मैनाक मेरा शत्रु बना। उसे वही समुद्र ने अपने पेट में छिपाकर सुरक्षित कर लिया। और जिस अश्वरूपी अग्नि ने सम्पूर्ण चराचर जगत को दग्ध कर दिया था, उसी भयंकर बाड़वाग्नि को उस दुष्ट समुद्र ने अपने भीतर दबा लिया। यही नहीं—वह अधर्मी दानवों का आश्रयस्थल भी है। इसी कारण हमें उसका मंथन करना पड़ा।” ॥१९–२१॥

👉 इस संवाद में इन्द्र का गर्व, दुर्वारण का अहंकार और देवासुर संघर्ष की जड़ स्पष्ट दिखाई देती है। यह प्रसंग केवल कथानक ही नहीं, बल्कि मानव स्वभाव के अहंकार और वैराग्य का गूढ़ संकेत भी समेटे हुए है।

वह समुद्र सदा ही दानवों को दुग्ध, दधि और घृत का दान करता आया है। इसी कारण मैंने उसके मन्थन का संकल्प किया था।।२२।।

पूर्वकालीन देवताओं ने उसे दण्डित किया और उसके वैभव का हरण कर, उसे दरिद्र और निःश्री बना दिया। हे दूत! मेरे परम पूज्य ब्राह्मण, अगस्त्य मुनि ने तो प्रतिज्ञा करके उसके जल को भी पान कर लिया।।२३।।

वह सागर, दुष्टों की संगति में पड़कर निरंतर कलुषित और अशांत रहता है। और जहाँ तक जालन्धर का प्रश्न है—वह भी जब युद्धभूमि में आएगा, तो हमारी सम्पूर्ण दिव्य सेना उसे चारों ओर से घेरकर, नष्ट कर देगी।।२४।।

नारदजी कहते हैं—इन्द्र ने इस प्रकार जोर से कहकर सागरपुत्र जालन्धर को ललकारा और फिर मौन हो गए। उसी समय वह दूत जालन्धर के पास पहुँचा और उसने इन्द्र के मुख से निकली हुई सम्पूर्ण बातें जाकर ज्यों की त्यों सुना दीं।।२५।।

इस प्रकार श्री पद्ममहापुराण के उत्तरखण्ड में नारद–युधिष्ठिर संवादान्तर्गत जालन्धरोपाख्यान का पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।५।।

प्रिय भक्तजनों, यह अध्याय पाँच का प्रारम्भिक प्रसंग था — जहाँ जालन्धर ने इन्द्र को अपना दूत भेजकर देवताओं से टकराव की नींव रखी।

आगे की कथा में हम जानेंगे — इन्द्र और जालन्धर के मध्य वह दूत क्या संदेश लेकर आया और कैसे देवासुर संघर्ष की भूमि तैयार हुई।

✨ जुड़े रहिए — पद्म महापुराण की इस अद्भुत यात्रा में ✨

🔥 अगला भाग: दूत का संदेश, इन्द्र की प्रतिक्रिया और युद्ध की तैयारी — जल्द प्रकाशित होगा।

जय श्री हरि 🙏