Current image: नारदजी द्वारा पार्वतीजी के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए दिव्य दृश्य, जहाँ नारद मुनि वीणा बजाते हुए माता पार्वती के रूप का गुणगान कर रहे हैं।

नारदजी द्वारा पार्वतीजी के सौन्दर्य का वर्णन

जब असुरराज जालन्धर अत्यंत शक्तिशाली हो गया । उसके तेज और तप से देवता पराजित हो गए । यहाँ तक कि भगवान विष्णु भी उसे छल से न मार सके, क्योंकि उसकी पत्नी वृन्दा (तुलसी) के पातिव्रत्य बल ने उसे अजेय बना दिया था।

जालंधर तीनो लोक पर कब्ज़ा कर लिया। यही नहीं धरती पर स्वर्ग जैसा जीवन शुरू कर दिया। यहाँ कोई मानव, दानव की मृत्य नहीं होती थी क्योकि उसने रणनीति के तहत सबसे पहले यमपुरी पर ही हमला करके यमराज को अपने अधीन कर लिया था। बाद में स्वर्ग पर हमला किया था। अब मृत्यु नहीं होने और मन में संकल्प करते ही इच्छित वस्तु हाजिर हो जाये तो मानव देवता को क्यों पूजे। और जब देवता की पूजा नहीं होने लगा तो देवता कमजोर होने लगे। सृष्टि का चक्र ही बिलकुल रुक गया। 

घोर पराजय और स्वर्ग छीन जाने के पीड़ा से इन्द्र और देवता ब्रह्माजी की सहायता लेकर भगवान शिव के पास पहुंचे। अबतक जितने हथियार बनाये गए थे उनसे भगवान शिव और श्री हरी भी जालंधर को नहीं मार सकते थे। आज आज जहाँ सामान्य आयुद्ध से युद्ध नहीं जीता जा सके वहाँ एटम बॉम्ब या हाइड्रोजन बॉम्ब का इस्तेमाल अंतिम विकल्प माना जाता है।  और यहाँ ऐसे ही अचूक हथियार बनाने की जरूरत थी जिससे जालंधर का विनाश तय हो जय।  इसलिए,  भगवान के तीनों रूप ब्रह्मा-विष्णु-महेश और सभी देवताओं  के तेज से सुदर्शन चक्र का निर्माण किया गया। 

अब जब घातक हथियार बन गए तो युद्ध होना चाहिए। देवता सीधे जालंधर पर हमला नहीं कर सकते थे। कोई कारण होना चाहिए ताकि जालंधर गलती करे और युद्ध करने का रास्ता मिल जाये।  लेकिन जालंधर तीनों लोक जितने के बाद, कोई गलती नहीं कर रहा था। सबको समान अधिकार और सम्मान दे रहा था।  तब एक ही रास्ता बचता है जो वह सबकुछ कर सकते हैं जो कोई नहीं कर सकता।

जालंधर के सामने नारदजी द्वारा पार्वतीजी के सौन्दर्य का वर्णन करने के लिए देवताओं की प्रार्थना

तब देवताओं ने नारदजी से प्रार्थना की —

  1. “हे देवर्षि! कोई उपाय करें जिससे यह दैत्य अपने धर्म से भ्रष्ट हो जाये।”
  2. यह  दैवी योजना का रहस्य था। 
  3. शिव और विष्णु — दोनों की योजना यही थी कि वृन्दा के पातिव्रत्य बल से रक्षित जालन्धर सीधे युद्ध से नहीं मारा जा सकता
  4. इसलिए पहले उसके मन को भ्रष्ट करना आवश्यक था।
  5. नारदजी उस कार्य के दैवी माध्यम बने।

दोस्तों, नारदजी किसी के मित्र या शत्रु नहीं होते —

  1. वे परमात्मा के संदेशवाहक हैं, और जब असुर का अंत समय आता है,
  2. तो वही उसके अहंकार का दर्प तोड़ने का माध्यम बनते हैं।
  3. जब  मनुष्य या असुर अपने बल, तप, और शक्ति पर गर्व करता है,
  4. तब उसका पतन निश्चित है।
  5. नारदजी ने कोई अधर्म नहीं किया,
  6. बल्कि धर्म की पुनर्स्थापना का कार्य किया —
  7. जिससे अधर्म रूपी जालन्धर का अंत हो सके और पृथ्वी पर पुनः संतुलन स्थापित हो।

नारदजी द्वारा पार्वतीजी के सौन्दर्य का अद्भुत वर्णन

पद्म महापुराण कथा के अनुसार, नारदजी ने कहा- देवताओं की प्रार्थना करने पर मैं जालन्धर के पास गया और कहा कि हे सभी वीरों में अग्रगण्य! आपको मारने के लिए शम्भु ने प्रतिज्ञा की है । हे राजन् ! मेरी इस वाणी को सुनकर उस असुर ने पूछा। जालन्धर ने कहा- हे महामुने ! शङ्कर के गृह में कौन सा रत्न है ? आप उन सबों को मुझे बतलाएँ व्यर्थ के युद्ध तो होता नहीं है।

नारदजी ने कहा उनके शरीर में भस्म है, बूढ़ा बैल है, उनके शरीर में सर्प रहते हैं, गले में विष है, हाथ में भिक्षा का पात्र है और उनके दो पुत्र हैं गजानन और षडानन।  यही उनके ऐश्वर्य हैं ।

जो दूसरा रत्न है, उसे मैं बतलाता हूँ । हिमालय की पुत्री पार्वती कामदेव को जला देने पर भी शङ्करजी पार्वती के रूप पर मोहित हो गए । उनको प्रसन्न करने के लिए महेश सदा कौतुक किया करते हैं।

शम्भु नृत्य करके तथा गीत गाकर उनको हँसाते रहते हैं। उनका नाम पार्वती है वह सौन्दर्य की अधिष्ठातृ देवी है। 

राजन् ! वृन्दा सुन्दरी है ये अप्सराएँ भी सुन्दर हैं किन्तु इन सबों में पार्वती के सौन्दर्य का सोलहवाँ अंश भी नहीं है।

हे राजन् ! इस तरह से क्रोधी जालन्धर से कहकर मैं सभी दैत्यों के सामने ही क्षणभर में अन्तर्धान हो गया।  

नारदजी द्वारा पार्वतीजी के सौन्दर्य का वर्णन का असर

नारदजी द्वारा पार्वतीजी के सौन्दर्य का वर्णन जल्दी ही असर दिखाया। नारद जी के जाने के तुरंत  बाद ही जालन्धर ने राहु को अपना दूत बनाकर भेजा । वह क्षण भर में कैलास पर भगवान् शिव के गृह को देखा। 

इसी बीच श्रीहरि शङ्करजी से विदा लेकर भेद की शङ्का से सबों से अलक्षित होकर शीघ्र ही क्षीरसागर में चले गये।  राहु ने शङ्करजी के अत्यन्त दीप्ति सम्पन्न गृह को देखा वह अपने से ही अपने शरीर को प्रतिबिम्बित देखकर आश्चर्रित होकर सोचा कि यह क्या है ? 

वह भीतर जाना चाहता था किन्तु बलवान् द्वारपालों ने उसको रोक दिया। रोकने पर भी जब वह भीतर जाने का प्रयास किया तो उन सबों ने आयुध धारण कर लिया । उन सबों को रोककर नन्दी ने राहु से कहा अरे दुष्ट ! तुम कौन हो ? यहाँ क्यों आये हो ? तुम्हें क्या काम है ? जब तक ये भयङ्कर तुम्हें मार न दें उससे पहले ही अपना काम बतलाओ।  राहु ने कहा- मैं जालन्धर का दूत हूँ तुम मुझे शिवजी के पास ले चलो। हे द्वारपाल ! महाराज के प्रयोजन को दूसरे को नहीं बतलाया जा सकता है।  

दूत की बातों को सुनकर नन्दी शिवजी के पास आये। वे शङ्करजी के समक्ष साष्टाङ्ग-प्रणाम करके शङ्करजी से कहे। प्रभु  ! द्वार पर राहु किसी कार्य से आया है। उसे आपके पास भेजूं अथवा वापस भेज दूँ , आप जैसी आज्ञा दें ।

उसके बाद नन्दी की बात को सुनकर शङ्करजी शीघ्रता से अन्तःपुर में सोयी हुयी पत्नी पार्वती देवी को सखियों के साथ गुप्त स्थान में भेज दिए ताकि राहु की नजर न पड़े।   उसके पश्चात् द्वारपाल से कहे, नन्दी ! दूत को भीतर लाओ । उसके बाद महाबलवान् नन्दी दूत का हाथ पकड़कर लाये और देवताओं के बीच में विद्यमान शिवजी को उसे दिखाये ।

राहु ने जटाधारी उस नीलकण्ठ को उस कक्ष के भीतर देखा। उनके पाँच मुख और दश भुजायें थी। वे सर्पों के यज्ञोपवीत धारण किए थे। उनका शिर चन्द्रमा से अलंकृत था। उनके शरीर में फुफकार मारते हुए सर्प लिपटे थे। उनके शरीर में फुफ्कार मारते हुए सर्प लिपटे हुए थे। उनके साथ सभी देवगण विद्यमान थे और करोड़ों गण उनकी सेवा में थे। दूत को आये हुए जानकर शिवजी उससे कहे- कहो, क्या कहना है ? उसके बाद राहु ने कहना प्रारम्भ किया।  

राहु ने कहा- हे देव । जालन्धर ने मुझको आपके पास भेजा है। उसकी शिष्ट वाणी को सुनकर आप उसका शीघ्रता से पालन करें। हे गिरिश ! आप तपस्वी हैं, निर्गुण और अधार्मिक हैं। आपकी कोई न तो माता है और न पिता है। आप धन सम्पत्ति और गोत्र से रहित हैं। और इस त्रैलोक्य के स्वामी जालन्धर हैं । आप भी उन्हीं के अधीन हैं इसलिए आप उनकी बातों का पालन करें। आप बूढ़े पुरुष हो तथा कामी हो । तुम वृषभ पर क्यों चढ़ते हो । 

दोस्तों, इसी बीच एक विचित्र घटना घटी। राहु जब इस तरह कह रहा था उसी समय शङ्करजी के पुत्र स्कन्द और गणेशजी भी आ गये।

उस समय शङ्करजी बिना बोले ही अपने हाथों को फैलाकर अङ्ग को रगड़े तबतक वासुकि पृथिवी पर गिर पड़े। गणेशजी के वाहन चूहे की पूंछ को वासुकि ने पकड़ लिया । अपने वाहन को रोते बिलखते  देखकर गणेशजी ने वासुकि से कहा छोड़ो छोड़ो इसे।

उसी समय स्कन्दजी के वाहन  मयूर को क्रोध में  देखकर, उसके भय से वासुकि ने चूहे की पूंछ को छोड़ दिया। उसके बाद छिपकर वह शङ्करजी के शरीर पर चढ़ गया और शिवजी के गले में लिपट गया । वासुकि ने शिवजी के गले में लिपटते ही मयूर की ओर जोड़दार फुंफकार लगाया। उस के निःश्वास वायु से अग्नि प्रगट हो गयी। उस अग्नि की गर्मी से शङ्करजी की जटा-जूट रूपी वन में विद्यमान चन्द्रमा की कला पिघल गयी और उससे शङ्करजी का शरीर मानो घुल गया। 

चन्द्रमा की अमृत की धाराओं से शङ्करजी के शिर पर विद्यमान ब्रह्माजी के शिरों की माला जीवित हो गयी।  उसने अपने पहले अभ्यस्त श्रुतियों का  पाठ किया । उसको सुनकर अपने द्वारा वेद के विषय में उस माला के सभी शिर विवाद करने लगे कि मैं ही प्रथम ब्रह्मा हूँ, मैं ही प्रथम हूँ। मैं ही सबों से प्राचीन हूँ। मैं ही सृष्टि करने वाला हूँ, मैं रक्षा करने वाला हूँ।

इस तरह से वे सभी शिर बोल रहे थे । ये सभी सोचते थे कि मैंनें न तो दान दिया, न भोग किया और न तो मैंने होम किया और लोभ के कारण मैंने न तो ब्राह्मणों को धन दान दिया। ब्रह्माजी के सिरों की आपस में वाद विवाद चल ही रहा था कि महेश्वर के जटाजूट से एक महान गण प्रकट हुआ । उसके तीन मुख थे, तीन चरण थे, तीन पूछें थीं और उसके सात हाथ थे । उसकी पीली जटायें थी तथा उसका नाम कीर्तिमुख था । उसको देखकर वे सभी कपाल समूह भय के कारण मरे के समान चूप हो गये। 

शङ्करजी के सामने आकर उस कीर्तिमुख ने प्रणाम किया और कहा देव ! मुझे बहुत भूख लगी है। उस समय शङ्करजी ने कहा- युद्ध में मारे गये जीवों को तुम खा लो ।

क्षणभर में वह पूरा ब्रह्माण्ड घूम लिया लेकिन उस गण को कहीं पर युद्ध न दिखा तब वह ब्रह्माजी को ही खाना चाहा तो उसको शङ्करजी ने रोका, उसके बाद उस कीर्तिमुख ने अपने सम्पूर्ण शरीर को ही खा लिया।

अत्यन्त भूखे तथा हर तरह से रोके गये कीर्तिमुख के साहस तथा भक्ति को देखकर शङ्करजी ने उससे कहा तुम मेरे छत प्रासाद पर सदैव रहा करो । मेरे घर में तुम्हारा ध्यान जो न करे उसे खाया करना । इस तरह से कहने पर वह कीर्तिमुख शङ्करजी के शिर में ही विलीन हो गया। उस समय देवताओं ने शङ्करजी पर पुष्पों की वृष्टि की।

शङ्करजी की सभा में इस अत्यन्त आश्चर्य को देखकर राहु आश्चिर्यित होकर पुनः शङ्करजी से कहा, आप स्वाधीन योगी हैं आपको भाव कैसे स्पर्श कर सकते हैं । इन्द्रियाँ आपकी पूजा करती हैं इन  विषयों से प्राप्त होना कैसे सम्भव है ?  ब्रह्मा आदि लोकपाल आपकी सदा पूजा करते हैं।

आप न तो किसी देवता को देखते हैं और न तो किसी की आप पूजा करते हैं। आप तो ईश्वर हैं। लोक में भिक्षान्न भोजी रूप से प्रतिष्ठित हैं। हे योगीन्द्र ! आप देवी गौरी को छिपाये हुए हैं उनको आप मुझे दे दें। अब आप अपने लम्बोदर तथा स्कन्द इन दोनों पुत्रों के साथ भिक्षा पात्र लेकर घर-घर भीख माँगना।

इस तरह से राहु ने भगवान् शिव को बहुत सी बातों को कहा और भगवान् शिव उसको सुनकर कुछ भी उत्तर नहीं दिये। उसके पश्चात् मौन हुए शिवजी को छोड़कर राहु ने नन्दी से कहा- तुम इनके मन्त्री हो तथा भयङ्कर तुम्हारा मुख है।  इस तरह से भ्रष्ट आचरण वाले इनको तुम बतलाओ । ये यदि इन बातों को नहीं मानेंगे तो इन्द्र के समान रण में मार दिए जायेंगे।

इस तरह की राहु की बातों को सुनकर नन्दी ने उन बातों को शङ्करजी से कहा और शङ्करजी के भौहों के इशारे से उनके अभिप्राय को जानकर श्रेष्ठगण नन्दी ने राहु की पूजा की और उसको वापस भेज दिया । उसके बाद राहु जालन्धर के पास जाकर सारी बातों को तथा गौरी के मनोहर रूप का विस्तार से वर्णन किया जब वह गौरी को देखा तक नहीं था। इस तरह युद्ध के आधार का पहला विशात नारदजी की लीला पूरा हो चूका था। 

दोस्तों, जालंधर से मिलने के बाद नारदजी सीधे क्षीर सागर पहुँचते हैं जहाँ भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी के साथ वास कर रहें है। लेकिन यहां एक समस्या है, देवी लक्ष्मी जालंधर को अपना भाई मानती है और श्रीहरि से वचन ले चुकी है की वह जालंधर का वध नहीं करेंगे। तो कैसे नारदजी श्रीहरि को युद्ध में शामिल होने के लिए राजी करेंगे ? क्या देवी लक्ष्मी ऐसा करने देगी ? क्या श्रीहरि देवी लक्ष्मी को दिए वचन को तोड़ देंगे या निभाएंगे ? जानेंगे अगली कथा में। 

बोलो शिव पारवती की जय 

बोलो श्री लक्ष्मी नारायण की जय 

 

Source: श्रीमद्भगवद्गीता