जालंधर की अहंकारपूर्ण चुनौती और भगवान शिव का क्रोध | Padma Purana Uttar Khand Adhyay 3 Part 3
पिछले भाग में आपने पढ़ा — इन्द्र, अप्सराएं, गंधर्व और समस्त देवगण अपने विमानों में बैठकर कैलाश पर्वत पर पहुंचे। अपूर्व सुगंधों से महकता वह पर्वत, जैसे पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आया हो। अब देवताओं ने शिव से एक विशेष निवेदन किया — एक दिव्य नृत्य का आयोजन। पर यह आयोजन, एक ऐसी घटना का आरंभ बन गया जिसने आगे चलकर समुद्र से जन्म देने वाला था एक महाशक्ति को…
यह है पद्म पुराण उत्तर खण्ड के तीसरे अध्याय की कथा का तीसरा भाग, जिसमें आप जानेंगे:
- 1. इंद्र का भगवान शिव के समक्ष नृत्य करना
- 2. देवियों का संगीत व नृत्य प्रदर्शन
- 3. भगवान शिव द्वारा वरदान देना
- 4. जालंधर (नाकासिंधु) का उद्भव
- 5. भगवान शंकर के क्रोध से उत्पन्न “क्रोध” की रहस्यमयी मूर्ति
यह भाग न केवल एक दिव्य प्रसंग को उजागर करता है, बल्कि यह बताता है कि कैसे अहंकार और शक्ति का मिश्रण एक नए असुर की उत्पत्ति करता है।
🔸 श्लोक 28
“नृत्यार्थमथ तं प्राहानय शीघ्रं शचीपतिम् ।
प्रवेशयामास तदा नन्दी तैः सह वासवम् ॥२८॥
हिन्दी अर्थ:
नृत्य हेतु शिवजी ने नंदी से कहा कि शचीपति इन्द्र को शीघ्र ले आओ। फिर नंदी ने इन्द्र को अन्य देवताओं सहित भीतर प्रवेश कराया।
व्याख्या:
यहाँ शिव स्वयं नृत्य देखने की सहमति देते हैं। इन्द्र को नृत्य के लिए आमंत्रित किया गया — यह कोई साधारण आमंत्रण नहीं था, बल्कि एक दिव्य आयोजन की शुरुआत थी।
🔸 श्लोक 29
“स दृष्ट्वा गिरिशं देवं तुष्टाव वृषभध्वजम्।
रम्भाद्यास्तास्तदा सर्वा नर्तक्यो हरसन्निधौ ॥२९॥
हिन्दी अर्थ:
गिरिश देव को देखकर इन्द्र ने उनकी स्तुति की। रम्भा आदि सभी अप्सराएं भी शिव के समक्ष नृत्य के लिए उपस्थित हुईं।
व्याख्या:
यह दृश्य दर्शाता है कि स्वर्ग की श्रेष्ठ अप्सराएं — रम्भा, उर्वशी, तिलोत्तमा — स्वयं शिव के सामने नृत्य प्रस्तुत करने आईं। इससे शिव की महिमा और उनकी स्वीकार्यता का स्तर स्पष्ट होता है।
🔸 श्लोक 30
“मृदङ्गवीणावादित्रैर्मुदा नाट्यं प्रचक्रिरे ।
कांस्यवाद्यान्प्रगृह्यान्या वंशतालान्सकाहलान् ॥३०॥
हिन्दी अर्थ:
मृदंग, वीणा और अन्य वाद्ययंत्रों के साथ अप्सराएं प्रसन्नता से नृत्य करने लगीं। अन्य देवियों ने कांस, वंशी, ताल और काहल जैसे वाद्य बजाए।
व्याख्या:
यह एक भव्य संगीत और नृत्य का आयोजन था। सभी ओर आनंद का वातावरण था। यह किसी देवी-यज्ञ के समान पवित्र था।
🔸 श्लोक 31
“चक्नुस्ता नृत्यसंरम्भं स्वयं देवः पुरन्दरः ।
अतीवनर्तनं चक्रे सुन्दरं देवदुर्लभम् ॥३१॥
हिन्दी अर्थ:
स्वयं देवराज इन्द्र ने भी उत्साहपूर्वक नृत्य आरंभ किया, और एक ऐसा सुंदर नृत्य किया जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ था।
व्याख्या:
इन्द्र, जिनका अभिमान अक्सर उनकी पहचान रहा है, यहां अपने समर्पण में रंगे हुए दिखते हैं — शिव के समक्ष स्वयं को भूलकर, उनकी आराधना में नृत्य करते हुए।
🔸 श्लोक 32
“ईश्वरस्तोषमापन्नो वासवं वाक्यमब्रवीत् ।
प्रसन्नोऽहं सुरश्रेष्ठ जातस्ते नियतां वरः ॥३२॥
हिन्दी अर्थ:
शिव प्रसन्न होकर इन्द्र से बोले — मैं प्रसन्न हूं, तुम पर एक निश्चित वरदान हुआ है।
व्याख्या:
इन्द्र का नृत्य शिव को अत्यंत प्रिय लगा। यह केवल सौंदर्य का नहीं, भक्ति और समर्पण का भी प्रदर्शन था।
🔸 श्लोक 33
“इत्युक्तवति देवेशे स्वबाहुबलगर्वितः ।
प्रत्युवाच हरं वाक्यं सङ्ग्रामः संवृतो मया ॥३३॥
हिन्दी अर्थ:
शिव के वरदान के बाद इन्द्र ने गर्वपूर्वक कहा — प्रभो, मैंने युद्ध का आयोजन किया है।
व्याख्या:
अब इन्द्र के भीतर छुपा अहंकार जागता है। वह वरदान का उपयोग शक्ति-प्रदर्शन के लिए करना चाहता है।
🔸 श्लोक 34
“यत्र त्वत्सदृशो योद्धा तद्युद्धं देहि मे प्रभो !
इत्युत्तवा निर्गतो जिष्णुर्लब्ध्वा शम्भोर्वरं प्रभो !
तस्मिन्गते तदा शक्रे गिरिशो वाक्यमब्रवीत् ॥३४॥
हिन्दी अर्थ:
इन्द्र बोले — जहां आपके समान योद्धा हो, वहीं युद्ध दीजिए। ऐसा कहकर वे चले गए। उनके जाते ही शिव ने अपने गणों से कहा…
व्याख्या:
यहाँ से कथा एक नया मोड़ लेती है — अहंकार और विनाश की दिशा में। शिव, अब गंभीर होते हैं।
🔸 श्लोक 35-36
“शङ्कर उवाच
गणा मे श्रूयतां वाक्यं देवराजोऽतिगर्वितः ॥३५॥
नारद उवाच
इत्युत्तवा क्रोधसंयुक्तो बभूव ततः हरः ।
आविरासात्ततः क्रोधो मूर्त्तिमान्पुरतः स्थितः ॥३६॥
हिन्दी अर्थ:
शिव बोले — हे गणों! सुनो, इन्द्र अत्यंत गर्वित हो गया है। ऐसा कहकर शिव क्रोध से भर उठे और उनके क्रोध ने मूर्ति का रूप धारण कर लिया।
व्याख्या:
यह वह क्षण है जब शिव का “क्रोध” एक अलग अस्तित्व ले लेता है — सजीव, सशक्त, एक दैविक प्रज्वलन।
🔸 श्लोक 37-38
“घनान्धकारसदृशो मृडं क्रोधस्ततोऽब्रवीत् ।
देहिमे त्वं हि सन्देशं किं करोमि तव प्रभो ॥३७॥
उमापतिस्तदौवाच गच्छ त्वं वासवं जय ।
स्वर्गसिन्धुं समासाद्य सागरस्य च वीर्यवान् ॥३८॥
हिन्दी अर्थ:
घने अंधकार के समान वह क्रोध मूर्ति बोला — प्रभो, मुझे आदेश दें, मैं क्या करूं? शिव बोले — जाओ, इन्द्र को जीत कर समुद्र और उसके वीर्य को प्राप्त करो।
व्याख्या:
शिव का आदेश किसी युद्ध से अधिक एक दिव्य योजना का हिस्सा था — जिससे आगे चलकर जालंधर का जन्म होगा।
🔸 श्लोक 39-40
;”इत्युक्तोऽन्तर्दधे क्रोधो गणास्ते विस्मयं ययुः ।
ईशानकल्पे जाते तु कामेनार्णवसङ्गमे ॥३९॥
नाकसिन्धुस्तदा मत्ता स्वयौवनभरोष्मणा ।
तां दृष्ट्वा सिन्धुराजश्च जलकल्लोलवानभूत् ॥४०॥
हिन्दी अर्थ:
ऐसा आदेश पाकर क्रोध रूप तुरंत अंतर्धान हो गया। सब गण चकित रह गए। इसके बाद समुद्र और कामदेव के संयोग से एक दिव्य घटना घटने वाली थी।
व्याख्या:
अब कथा बढ़ती है उस रहस्यमय संयोग की ओर — जो जन्म देगा एक महाशक्ति को, एक ऐसा राक्षस जो देवताओं को भी चुनौती देगा।
तो क्या यह क्रोध ही था जो आगे चलकर बना एक राक्षस? क्या समुद्र और काम की ऊर्जा से जन्मा कोई था जो स्वर्ग तक को डिगा देगा? जानिए अगली कड़ी में — पद्म पुराण उत्तर खण्ड अध्याय 3 के चौथे भाग में…
श्रद्धा और ज्ञान से भरी इस कथा को सुनें, समझें और आत्मा को शांत करें।
जय शिव शंकर! हर हर महादेव!
